Tuesday, 15 November 2016

दर्द तो होगा


यू हि नहीं नम हे ये नैन बेचारे,
निकले हे अश्क
कोइ मर्ज तो होगा ,
गर बहारों में महकेगी जो जिंदगी
तो जिंदगी का मौसम कभी शर्द भी होगा.
न वक़्त से शिकायत है ना लोगो से,
दिल ही तो है ना
जबतक धडकेगा
दर्द तो होगा ..

Friday, 11 November 2016

Ishq Aur Ehsaan


Kal the jo apne,

wo aaj ajnabi anjan ho gaye..

Ishq me kiya gaya har kaam unka

aaj ehsaan ho gaye.

Hum se teri meri ka fasla kitna jaldi tay karte hai rishte ye,

kabhi khamoshiyo me bhi baatein hoti thi, ,

aaj juban ke sath sath aankhe bhi bezuban ho gaye..

Har lamha sambhala rishta humne khud ki najro me gir kar,

aaj jara si narazagi kya dikhayi

to sabki najar me bewafa beimaan ho gaye..

Socha tha ishq kar ke milegi rooh ko rahat apni,

dil diya use aur hum bejaan ho gaye..

Monday, 7 November 2016

फिर से प्यार


हर शिकवे शिकायत दिल से बस दूर कर दे ,
फिर से प्यार करना सिख लूं मैं
तू मुझे इतना मजबूर कर दे..
जिस एहसास को दफना दिया मैंने दिल के कोने में कही,
जिस रास्ते से निकल आया मैं दूर कहीं,
ले चल उन रास्तो पे फिर से,
उस जमीन को तू फिर से नूर कर दे ..
फिर से प्यार करना सिख लूं मैं,
तू मुझे इतना मजबूर कर दे ..
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी के मायने दे जा,
ख़ुशी से दू तर कर दे..
बेफिक्रे मलंग सी इस ज़िन्दगी को .
तू अपने प्यार से बेसबर कर दे..
खोने के डर का एहसास दे तू,
पाने की खुशी की अहमियत फिर हो मुझे,
फिर से रुला मुझे उस प्यार के लिए,
फिर से प्यार हो मुझे,
पत्थर हो गया मैं इस पत्थर से लोगो के बिच,
तू मुझे अपने प्यार से कोहिनूर कर दे,
फिर से प्यार करना सिख लूं मैं,
तू मुझे इतना मजबूर कर दे .. 

Sunday, 30 October 2016

मोहब्बत के पैमाने



चल इस बार सोच का नहीं
ज़िन्दगी का दायरा बढ़ाये हम दोनों ,
तेरे हिस्से का ग़म मेरे हिस्से में आ जाये
और मेरे हिस्से की खुसी तेरे हिस्से समां जाये ..
चल इस बार बातो से नहीं
ज़िन्दगी से एक हो जाये हम दोनों,
तेरा दिल रहे
और मेरी साँसे हों..
चल इस बार बढ़ाये हम दुआओं का दायरा
मेरी दुआ तुझे लगे
और तेरी मुफ्लिशी मुझे लग जाये ..
अलग रहकर एक रहे हम
कोई बंधन कोई जोर हमे अलग न कर पाए ..
इस बार बदलते है पैमाने इश्क के
दिलो से नही आँखों सी मोहब्बत हो अपनी
एक रोये तो दूसरा न खुस रह पाए ..
किताबो से परे कहानियों से आगे
एक ऐसी प्रेम कहानी लिखी जाये तेरी और मेरी,
साँसे ख़त्म हो जाये हमारी
पर ये दास्तान ख़त्म न हो पाए ...

Wednesday, 5 October 2016

जंग और इंसान


तबाही का ये मंजर देखो,
हरियाली को तरसती धरती ये बंजर देखो॥
हर एक जर्रा बयान कर रही दास्तां जंग की ,
जंग के हिमायतियों तुम ये मंजर देखो ॥
खून से सनी हुई ये खेते देखो ,
तबाही की कहानी सुनाती ये रेतें देखो ॥
जहां तहां बिखरे कटे हुए ये अंग देखो ,
जंग के हिमायतियों
तुम ये भयानक रंग देखो ॥
तड़पती चीखे , टूटती साँसे देखो ,
टूटती चुड़ियाँ उजड़ती मांगे देखो॥
गर्दिशों के वो दिन देखो ,
सिसकती हुई वो राते देखो,
बेटे को रोटी मान की आंखे देखो ,
बाप को गले लगाने को तरशती उन बच्चो की बाहें देखो ॥
उजड़ा हुआ वो सहर , बंजर बने वो गाँव देखो,
खून की नदी बहती हार जीत की वो नाओ देखो ॥
तुमने तो दिखा दी घर बैठे अपनी देशभक्ति ,
मिल गयी तसल्ली मिल जाएगा श्रेय
पर जिनहोने सबकुछ गवाया उनका हाल देखो ॥
घर बैठे तुम जंग का रंग देखो॥
अगर हम निभा रहे देशभक्ति
तो वो भी तो अपना फर्ज़ निभा रहे है,
क्यू लड़ी जा रही जंग
क्या होगा इससे हासिल
बिना सोचे ये बस जान गवाए जा रहे है ॥
जंग से कोई कुछ पता नहीं बस गवाता है,
गुनहगार तो बचे रह जाते है,  बेगुनाह मारा जाता है ॥
छोड़ जाते वो पीछे बस आफ्नो को रोने के लिए,
हो जाती ज़िंदगी वीरान उनकी
नहीं बचता कुछ फिर खोने के लिए ॥
जंग तो बस कुछ दिनो की बात है
फिर खत्म हो जाता है,
पर इसका दर्द और दाग ताउम्र रह जाता है ॥ 

Tuesday, 6 September 2016

रात और चाँदनी



रात के आगोश मे
चाँदनी जो पिघल रही है॥
काजल सरीखी काली रात मे
रोशनी सी जल रही है॥
सरक रही धीरे धीरे घूँघट जो बादलों की,
हवाएँ उड़ा रही हया जो आंचलों की,
लोक लाज की दहलीज़ लांघ आज चाँदनी ,
खुद से निकल रही है॥
रात के आगोश मे
चंदनी जो पिघल रही है ॥
तारों की जमीन पर पाँव रखे,
हर कदम वो रात के पास आ रही है,
रात भी उसका दमन थामे खिच रहा उसे अपनी ओर,
सन्नाटे सी ये रात और गहरा रही रही है॥
हर एक दूरियाँ खत्म हो रही अब ,
रात भी तड़प रहा सामने को इसे खुद मे,
एक दूजे को होने के लिए दो रूनहे मचल रही है ॥
रात के आगोश में
चाँदनी जो पिघल रही है ॥
हाथ थामे ये रात की
छोड़ रही बादलों का दामन ,
हो रही पराई ये चाँदनी हर बंधन से,
बढ़ रही उस गली जहां है उसका साजन ,
डोली सजी है आज तारों की
और चाँदनी अपनी दुल्हन बन रही है ॥
रात के आगोश मे
चाँदनी जो पिघल रही है ॥ 

Monday, 5 September 2016

तुम वही थे ॥



तुम आए गुजरे थे राहों से होकर मेरे,
पर समझ न सके हम के तुम वही थे ॥
दहलीज़ पर रुके थे तुम इत्तेफाक से मेरे,
पर समझ न सके हम के  तुम वही थे ॥
शिकायते और दुआएं बदस्तूर जारी थी खुदा से
गुमान तो ये भी था के तुझे तेरी आहाट से पहचान लेंगे हम ,
तुम आए , रुके भी और चले बेरुख भी हो लिए
पर समझ न सके हम के तुम वही थे ॥
खिलौने से हो गए रिश्ते और बच्चो से हम
शिकायत रहती जितना मिल जाए कम ही है ,
न मिले खिलौने तो रोना धोना
मिल जाए तो कदर नहीं और नए और बेहतर की फिराक मे हम,
शायद यही वजह थी जो हम समझ न पाये तेरी एहसास को
तुम थे वही
पर समझ न सके हम के तुम वही थे ॥
चलो खैर तुम रुके नहीं पर आए तो सही,
खुसकीसमाती है के अपने होने का एहसास दिलाये तो सही।
इसी एहसास इसी बात की खुसी है॥
दिनो से सिकायत रहेगी तुम्हें रोक न पाये ये कुछ देर और
जिस रोज तुम आए अब हमे हर रात से खुसी है ॥
अब तनहीयों और चाँद से ताउम्र तेरा जीक्र करेंगे
के हाँ तुम वही थे
हाँ तुम वही थे ...